अमरूद की खेतीभारत पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा अमरूद पैदा करने वाले देशों में गिना जाता है. एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में लगभग 3 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा क्षेत्रफल में अमरूद की खेती होती है. लेकिन, अमरूद की खेती में सबसे बड़ी मुश्किल बरसात के मौसम में आती है. जुलाई से लेकर सितंबर तक के बरसात के मौसम में सबसे ज्यादा कीट और बीमारियां फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. इन सब बीमारियों में 'एन्थ्रेक्नोज' नाम की एक खास बीमारी अमरूद की फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होती है. इस खतरनाक बीमारी की वजह से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. अगर सही वक्त पर और सही तरीके से इस बीमारी का इलाज न किया जाए, तो फसल की पैदावार में 30 से 70 फीसदी तक की कमी आ सकती है. इसके साथ ही फलों की क्वालिटी इतनी खराब हो जाती है कि वे बाजार में बिकने लायक ही नहीं रहते.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार के पौध सुरक्षा विभाग के हेड डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, एन्थ्रेक्नोज एक फफूंद की वजह से होने वाली बीमारी है. अगर इसके लक्षणों की बात करें, तो बीमारी की शुरुआत नई और कोमल पत्तियों पर काले या चॉकलेटी रंग के धब्बों से होती है. धीरे-धीरे ये निशान पूरी पत्ती पर फैल जाते है और पत्तियां पीली होकर झड़ने लगती हैं. नई टहनियां ऊपर से काली पड़कर सूखने लगती हैं, जिसे डाइबैक कहते हैं. अगर इसका असर बढ़ जाए, तो फूल बनने से पहले ही कलियां मुरझाकर गिर जाती हैं. फलों पर छोटे धंसे हुए काले निशान बन जाते हैं, जो बाद में बड़े होकर फल को अंदर तक सड़ा देते हैं.
एन्थ्रेक्नोज बीमारी के फैलने के लिए कुछ खास मौसम और हालात बहुत ज्यादा मददगार साबित होते हैं. बरसात के दिनों में लगातार बारिश होना और पत्तियों पर लंबे समय तक नमी का बने रहना इस बीमारी को दावत देता है. जब हवा में 85 फीसदी से ज्यादा नमी हो और तापमान 24 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच रहे, तब यह फफूंद बहुत तेजी से असर दिखाती है. इसके अलावा, जिन बागों में पेड़ों की छंटाई नहीं होती और जहां बहुत घनापन होता है, वहां हवा का आना-जाना कम हो जाता है, जिससे बीमारी बढ़ती है. खेत में पानी का जमा होना और पहले से बीमार गिरे हुए पत्तों या फलों का बाग में पड़े रहना भी इस बीमारी को पूरे बाग में फैलाने का काम करता है.
डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, इस बीमारी से बचने के लिए सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहना काफी नहीं है, बल्कि साफ-सफाई और सही देखभाल भी जरूरी है. सबसे पहले गिरे हुए पत्तों, खराब फलों और सूखी टहनियों को बाग से बाहर निकालकर फौरन नष्ट कर दें. पेड़ों की सही ढंग से छंटाई करें ताकि धूप और हवा अंदर तक पहुंच सके. कटे हुए हिस्सों पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप जरूर लगाएं. अगर बीमारी के शुरुआती लक्षण नजर आएं, तो हेक्साकोनाजोल या प्रोपिकोनाजोल दवा की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. पहला छिड़काव फूल आने से 15 दिन पहले और दूसरा फल बनने के बाद करना चाहिए. इसके साथ ही ट्राइकोडरमा जैसे जैविक तरीकों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
किसानों को चाहिए कि जुलाई से सितंबर के बीच हर हफ्ते अपने बाग की कड़ी निगरानी करें. जैसे ही पत्तियों पर बीमारी का कोई शुरुआती निशान दिखे, फौरन बचाव का काम शुरू कर दें. बीमारी को फलों तक पहुंचने का मौका बिल्कुल न दें. खेतों में बारिश का पानी जमा न होने दें और यूरिया नाइट्रोजन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें. दवाओं का छिड़काव हमेशा सुबह या शाम के वक्त ही करें. बारिश के दौरान या ठीक पहले कभी छिड़काव न करें. अगर किसान भाई सही वक्त पर कदम उठाते हैं और इन सभी बातों का ख्याल रखते हैं, तो सर्दियों की अपनी बेशकीमती फसल को भारी नुकसान से बचा सकते हैं.
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