आकाशीय बिजली का पहले चलेगा पताउत्तर प्रदेश सरकार प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए तकनीक की मदद ले रही है. इसी कड़ी में पुणे स्थित 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी' (IITM) के सहयोग से राज्य के पांच जिलों में आकाशीय बिजली का पता लगाने वाले सेंसर लगाए जा रहे हैं. जिन पांच जिलों में ये सेंसर लगाए जा रहे हैं, उनमें एटा, मेरठ, बलरामपुर, लखीमपुर खीरी और सोनभद्र शामिल हैं. इस सेंसर से समय पर चेतावनी मिलने से लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने का मौका मिल सकेगा और संभावित हादसों को रोकने में मदद मिलेगी.
आकाशीय बिजली का खतरा खासकर बारिश के मौसम में खेतों में काम करने वाले किसानों, मजदूरों, ग्रामीणों और पशुपालकों को रहता है. कई बार खुले जगहों पर काम करने के दौरान बिजली गिरने से जान-माल का नुकसान हो जाता है. ऐसे में चेतावनी सेंसर से मिलने वाली जानकारी लोगों को समय रहते सतर्क करने में मदद कर सकती है. इसके अलावा, स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियां भी अलर्ट मिलने पर बचाव के जरूरी कदम उठा सकेंगी.
सोनभद्र जिले में भी आकाशीय बिजली से बचाव के लिए विशेष व्यवस्था की जा रही है. जिले के दुद्धी ब्लॉक के 32 गांवों में 1.33 करोड़ रुपये की लागत से ‘लाइटनिंग डिटेक्शन और अर्ली वार्निंग सिस्टम’ लगाया जा रहा है. इस व्यवस्था का मकसद बिजली गिरने के खतरे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों तक समय रहते सूचना पहुंचाना है, ताकि वे सतर्क होकर सुरक्षित स्थानों पर जा सकें.
राहत आयुक्त कार्यालय के मुताबिक, प्रदेश में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए अब केवल हादसे के बाद राहत पहुंचाने पर ही नहीं, बल्कि खतरे का पहले पता लगाने और नुकसान रोकने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. आकाशीय बिजली की निगरानी करने वाले सेंसर इस दिशा में मददगार साबित हो सकते हैं. तकनीक के साथ लोगों में जागरूकता बढ़ाने और समय पर चेतावनी पहुंचाने से प्राकृतिक आपदाओं के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जा रही है.
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