भारत में जीएम-जीई फसलों पर महामंथनकृषि विज्ञान की उन्नति के लिए ट्रस्ट (TAAS), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय बीज उद्योग परिसंघ (FSII) के साझा सहयोग से "आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) और जीनोम-संपादित (GE) फसल पौधों के विनियमों में सुधार और अनुमोदन" विषय पर एक बेहद अहम और उच्च-स्तरीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देश-विदेश के नीति निर्माताओं, मशहूर कृषि वैज्ञानिकों, नियामकों, कृषि उद्योग जगत से जुड़ी हस्तियां अर्थशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय कृषि विशेषज्ञ सहित 80 से अधिक प्रतिभागियों ने साथ शिरकत की. इस ख़ास बैठक की अध्यक्षता डा. एम.एल. जाट महानिदेशक, आईसीएआर ने की. इस पहल का मुख्य मकसद भारत के कृषि जैव प्रौद्योगिकी नियामक ढांचे को आधुनिक बनाना और उसमें जरूरी सुधार लाना है. डॉ. एम.एल. जाट ने राष्ट्रीय महत्व के इस संजीदा विषय पर रचनात्मक बातचीत के लिए सभी प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाने की जमकर सराहना की.
बैठक के दौरान डॉ. एम.एल. जाट ने विज्ञान और साक्ष्य पर आधारित कृषि नवाचारों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता दोहराई. उन्होंने एक ऐसे संतुलित और मजबूत नियामक ढांचे की जरूरत पर खास तौर से जोर दिया, जो देश में खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता और सतत कृषि विकास को हासिल करने के लिए आधुनिक जैव प्रौद्योगिकियों की सुरक्षित तैनाती में पूरी तरह मददगार साबित हो सके. इस सम्मेलन TAAS के अध्यक्ष डॉ. आर.एस. परोदा ने इस बात पर पूरी तरह इत्तेफाक जताया कि बदलती जलवायु और बढ़ती आबादी की जरूरी मांग को पूरा करने के लिए भारत को अपने कृषि तंत्र को और अधिक मजबूत और आधुनिक बनाना होगा. उन्होंने कहा कि सही फैसलों से ही हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए खाद्यान्न सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं.
भारत ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और 1989 के नियमों के तहत ट्रांसजेनिक फसलों के लिए एक व्यापक बहु-स्तरीय नियामक प्रणाली की नींव रखी थी. वर्तमान में इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में संस्थागत जैव सुरक्षा समितियां (IBSC), आनुवंशिक हेरफेर पर समीक्षा समिति (RCGM), जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC), और FSSAI जैसी कई बड़ी संस्थाएं शामिल हैं. हालांकि, CRISPR-Cas जैसी आधुनिक प्रणालियों और जीनोम-संपादन तकनीकों में आ रही तेज तरक्की ने इस बात का अनुरोध किया है कि भारत अपने पुराने नियमों की समीक्षा करे. हालांकि भारत ने जीन-संपादित उत्पादों की कुछ श्रेणियों के लिए एक अलग नजरिया अपनाया है, लेकिन नियामक प्रणाली में स्पष्टता, निरंतरता और पारदर्शिता लाने के लिए व्यापक सुधारों की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि नई खोजें बिना किसी अड़चन के किसानों तक पहुंच सकें.
इसके बाद TAAS के सचिव डॉ. भागमल ने जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और जैव प्रौद्योगिकी में हो रही तेज प्रगति के मद्देनजर भारत के नियमों को आधुनिक बनाने की पुरजोर वकालत की. दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (SABC) के अध्यक्ष डॉ. ए.के. सिंह ने नियामक सुधारों को वक्त की मांग बताया. इसके अलावा, ISAAA इंक की कार्यकारी निदेशक डॉ. रोडोरा रोमेरो-एल्डेमिता और यूके के कृषि अर्थशास्त्री श्री ग्राहम ब्रूक्स ने अपने अहम व्याख्यानों के जरिए दुनिया भर में जीएम और जीनोम-संपादित फसलों से मिलने वाले आर्थिक फायदों और वैश्विक मानकों के समन्वय पर अपने कीमती अनुभव साझा किए. इन सभी विशेषज्ञों का मानना था कि सही नीतिगत फैसलों से ही कृषि में क्रांतिकारी बदलाव संभव है.
इस गोलमेज सम्मेलन का सबसे बड़ा निष्कर्ष निकला कि राष्ट्रीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जीएम और जीई फसलों की प्रभावी स्वीकृति के लिए एक पारदर्शी रोडमैप तैयार करना चाहिए. वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इस बात पर पूरी सहमति जताई कि जैव सुरक्षा मानकों से बिना कोई समझौता किए नियामक दक्षता को बढ़ाना भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहद जरूरी है. जब हमारे किसानों को सुरक्षित, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-अनुकूल बीज उपलब्ध होंगे, तो न केवल उनकी पैदावार बढ़ेगी बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी नई ताकत मिलेगी. यह दूरगामी पहल भारत को कृषि और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने के लिए एक मजबूत बुनियाद है. आने वाले वक्त में यह सुधार भारतीय कृषि के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होंगे.
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