रबी फसलों पर अल नीनो का बेहर गंभीर असरदेश के कई हिस्सों में कमजोर मॉनसून और अल नीनो के प्रभाव ने खरीफ फसलों के बाद अब रबी सीजन के लिए भी चिंता बढ़ा दी है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में बारिश की भारी कमी के कारण रबी फसलों की बुआई और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं. सबसे बड़ा खतरा उन इलाकों में है जहां खेती बड़े पैमाने पर वर्षा आधारित है.
रबी फसलें मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में बोई जाती हैं और इनकी सफलता मिट्टी में उपलब्ध नमी, सिंचाई और सर्दियों में होने वाली बारिश पर निर्भर करती है. गेहूं, चना, सरसों, मसूर जैसी प्रमुख फसलों के लिए शुरुआती चरण में पर्याप्त नमी बेहद जरूरी होती है. ऐसे में लंबे समय तक सूखा रहने या बारिश की कमी होने से न केवल बुआई का रकबा घट सकता है, बल्कि पैदावार पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में सितंबर महीने में सामान्य से 9 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई, जबकि अक्टूबर के पहले 18 दिनों के दौरान वर्षा में 55 फीसदी की कमी रही. इसके कारण किसानों के सामने रबी सीजन की तैयारियां चुनौतीपूर्ण हो गई हैं.
महाराष्ट्र की स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है. राज्य सरकार ने 358 में से 305 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है. सितंबर में राज्य में 52 प्रतिशत कम बारिश हुई थी, जबकि अक्टूबर के शुरुआती 18 दिनों में सामान्य बारिश का केवल 3 प्रतिशत ही रिकॉर्ड किया गया. इसका सीधा असर जलाशयों, तालाबों और भूजल स्तर पर पड़ा है.
मध्य प्रदेश में सितंबर के दौरान सामान्य से अधिक वर्षा होने के बावजूद अक्टूबर में 96 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है. इससे किसानों को रबी फसलों की बुआई के लिए जरूरी नमी मिलने में दिक्कत हो सकती है.
उत्तर प्रदेश में अक्टूबर के दौरान 37 प्रतिशत बारिश की कमी रही है, लेकिन सितंबर में 65 प्रतिशत अधिक वर्षा के कारण खेतों में नमी का स्तर अपेक्षाकृत बेहतर माना जा रहा है. इससे गेहूं और अन्य रबी फसलों की बुआई को सहारा मिल सकता है.
वहीं पंजाब और हरियाणा में अक्टूबर की बारिश ने किसानों को राहत दी है. सितंबर में भारी कमी के बाद अक्टूबर के पहले 18 दिनों में पंजाब में सामान्य से 256 प्रतिशत और हरियाणा में 191 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह बारिश नवंबर में गेहूं की समय पर बुआई के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है.
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश देश के प्रमुख रबी उत्पादक राज्य हैं. इन राज्यों में गेहूं, चना, सरसों और मसूर जैसी फसलों की बड़े पैमाने पर खेती होती है. यदि बारिश की कमी और जल संकट बना रहता है तो इसका असर देश के कुल खाद्यान्न, दाल और तिलहन उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है.
सूत्रों के मुताबिक राजस्थान में रबी सीजन की शुरुआत धीमी रही है. अब तक चने का रकबा 6 हजार हेक्टेयर से भी कम और सरसों का रकबा करीब 1 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा है, जबकि राज्य ने इस वर्ष चने के लिए 21.5 लाख हेक्टेयर और सरसों के लिए 37.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र का लक्ष्य रखा है.
पूर्व कृषि आयुक्त जे.एस. संधू का कहना है कि दाल और तिलहन फसलें सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि इनके रबी क्षेत्र का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा वर्षा आधारित है. ऐसे में बारिश की कमी का सीधा असर इन फसलों की बुआई और उत्पादन पर पड़ सकता है.
उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में दालों का उत्पादन विशेष रूप से प्रभावित होने की आशंका है. यदि अल नीनो के कारण सर्दियों के अंतिम चरण में तापमान बढ़ा और फसलें समय से पहले पक गईं, तो दानों के भराव पर असर पड़ेगा और पैदावार घट सकती है.
जलाशयों में कम पानी होने से नहर आधारित सिंचाई वाले इलाकों में भी रबी फसलों का रकबा घट सकता है. जिन फसलों को सामान्य तौर पर एक या दो सिंचाई की जरूरत होती है, उनकी उत्पादकता भी प्रभावित होने की आशंका है.
विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा हालात में किसानों की सबसे बड़ी उम्मीद सर्दियों में सक्रिय होने वाले वेस्टर्न डिस्टर्बेंस पर टिकी है. भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाले ये मौसम तंत्र उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश लाते हैं और गेहूं समेत कई रबी फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
अगर सर्दियों में अच्छी बारिश होती है तो मिट्टी की नमी बढ़ेगी, सिंचाई की जरूरत कम होगी और फसलों को शुरुआती विकास के लिए पर्याप्त पानी मिल सकेगा. इससे रबी सीजन पर मंडरा रहे संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
हालांकि फिलहाल देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात और जलाशयों में घटते जलस्तर को देखते हुए कृषि क्षेत्र की निगाहें आने वाले महीनों के मौसम पर टिकी हुई हैं. रबी सीजन की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि सर्दियों में बारिश कितनी होती है और किसानों को नमी एवं सिंचाई का कितना सहारा मिल पाता है.
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