
राजस्थान के अलवर में कपास के भाव इन दिनों 8,400 से 8,700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच रहे हैं. इसके बावजूद किसान कपास की खेती में पहले जैसी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. इसकी बड़ी वजह खेती की बढ़ती लागत, बाजार भाव में उतार-चढ़ाव और भविष्य में मुनाफा मिलने को लेकर बनी अनिश्चितता है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलाव और बांग्लादेश जैसे देशों से जुड़े व्यापार पर पड़ने वाले असर को भी कपास के कारोबार के लिए अहम माना जा रहा है.
कपास के अच्छे भाव मिलने के बावजूद किसान अब खेती का फैसला करते समय सिर्फ मुनाफे को नहीं देखते. वे इस बात का भी हिसाब लगा रहे हैं कि फसल तैयार करने में कितना खर्च आएगा और बाजार में उपज बेचने पर कितना पैसा मिल सकेगा. इसी वजह से कपास की खेती के प्रति किसानों का रुझान थोड़ा कम हुआ है.
अलवर की उपज मंडी में इन दिनों प्रतिदिन करीब 500 से 600 गांठ कपास की आवक हो रही है. मंडी में कपास के भाव 8,400 रुपये प्रति क्विंटल से शुरू होकर 8,600 से 8,700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच रहे हैं. ये कीमतें किसानों के लिए आकर्षक मानी जा सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद कपास की पैदावार में बढ़ोतरी नहीं दिख रही है. किसानों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा भाव आगे भी बने रहेंगे या नहीं. खेती में खर्च लगातार बढ़ने और बाजार में कीमतों का भरोसा नहीं होने के कारण किसान दूसरी फसलों के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.
कपास की खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी पर खर्च करना पड़ता है. फसल तैयार होने तक किसान को कई तरह के जोखिम भी उठाने पड़ते हैं. अगर मौसम खराब हो जाए या फसल में कीटों का प्रकोप बढ़ जाए, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसके अलावा, मंडी में फसल बेचते समय मिलने वाला भाव भी किसान के मुनाफे को तय करता है. अगर उत्पादन लागत अधिक हो और बाजार भाव उम्मीद के मुताबिक न मिले, तो किसान को नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसी वजह से किसान अब सिर्फ मौजूदा कीमत देखकर कपास की खेती करने का फैसला नहीं ले रहे हैं. वे यह भी सोच रहे हैं कि फसल तैयार होने के समय बाजार में कितनी मांग होगी और उन्हें अपनी उपज का उचित दाम मिल पाएगा या नहीं.
कपास के कारोबार में अंतरराष्ट्रीय बाजार की अहम भूमिका होती है. भारत से दूसरे देशों को कपास का निर्यात किया जाता है. ऐसे में दूसरे देशों की आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के साथ व्यापार में होने वाले बदलावों का असर कपास की मांग और कीमतों पर पड़ सकता है. बता दें कि बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख कपड़ा निर्यातक देशों में शामिल है. वहां के कपड़ा उद्योग को कपास जैसे कच्चे माल की जरूरत होती है. बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और व्यापारिक परिस्थितियों में बदलाव से जुड़े घटनाक्रम का असर कपास के कारोबार पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का घरेलू बाजार पर कितना असर पड़ता है, यह मांग, निर्यात, उत्पादन और व्यापार की दूसरी स्थितियों पर भी निर्भर करता है. यही वजह है कि कपास के कारोबार से जुड़े लोग अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियों पर नजर रखते हैं.
भारतीय उद्योग व्यापार संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल जलालपुरिया के मुताबिक, कपास के मौजूदा भाव बेहतर होने के बावजूद किसान इसकी खेती को लेकर पहले जैसी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. खेती की बढ़ती लागत और भविष्य में मिलने वाले भाव को लेकर अनिश्चितता किसानों के फैसले को प्रभावित कर रही है. किसानों के लिए यह जरूरी है कि फसल बेचने के बाद उनकी लागत निकलने के साथ उचित मुनाफा भी मिले. लेकिन बाजार में कीमतों का अनुमान लगाना आसान नहीं है.
किसानों के सामने प्याज जैसी दूसरी फसलों का उदाहरण भी है. कई बार प्याज के अच्छे भाव मिलने पर किसानों को बढ़िया मुनाफा होता है, जबकि कुछ समय बाद कीमतें इतनी गिर जाती हैं कि लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है. कपास की खेती में भी बाजार की अनिश्चितता किसानों को सतर्क बना रही है.