बुंदेलखंड का इलाका हमेशा से ही पानी के लिए प्यासा रहा है यहां की पथरीली जमीन के साथ-साथ बारिश का पानी का भी संरक्षण नहीं होता था जिसके चलते हर साल गर्मी के दिनों में लोग प्यासे रहने को मजबूर होते थे. इसी समस्या के लिए उमाशंकर पांडे ने दिन-रात प्रयास किया. जल संरक्षण की परंपरागत विधि "खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़" बिना सरकार के सहयोग के हो सकती है. इस अभियान को गांव से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए सरकार ने उन्हें चुना है.