
16 अक्टूबर को दुनिया भर में विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है. इस वर्ष का मुख्य संदेश है- 'आज का नवाचार, कल का पोषण' आज हमारी दुनिया हर इंसान का पेट भरने के लिए पर्याप्त अनाज पैदा करती है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ का ऑर्गेनाइजेशन फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार आज भी लगभग 64.5 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं और 269 करोड़ लोग पौष्टिक भोजन नहीं खरीद पाते. इस वैश्विक संकट के बीच भारत की भूमिका सबसे अहम हो जाती है. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत ने खेती के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है. कभी अनाज के संकट से जूझने वाला भारत आज न केवल अपनी विशाल जनता का पेट भर रहा है, बल्कि दुनिया के कई देशों को अनाज निर्यात भी कर रहा है.
डिजिटल कृषि, यूपीआई (UPI) के जरिए किसानों तक सीधे आर्थिक मदद, स्वाइल हेल्थ कार्ड , पीएम किसान योजना और बाजरा यानी श्री अन्न जैसी पौष्टिक फसलों को बढ़ावा देकर भारत ने दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है. हालांकि, भारत में भी भोजन की बर्बादी रोकने, गिरते भूजल स्तर को सुधारने और छोटे किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाने की चुनौतियां अब भी मौजूद हैं. अगर हम तकनीक, स्थानीय ज्ञान और सही नीतियों को एक साथ लाएं, तो भारत दुनिया से भुखमरी मिटाने के इस वैश्विक मिशन में सबसे बड़ा लीडर बन सकता है.
भुखमरी को पूरी तरह खत्म करने के लिए आधुनिक विज्ञान और स्थानीय अनुभवों को एक साथ लाना जरूरी है. भारत में डिजिटल एडवाइजरी सेवाओं से किसान अपने मोबाइल पर ही मौसम, फसल की बीमारियों और मंडी भावों की सटीक जानकारी पा रहे हैं. ड्रोन तकनीक से खाद का छिड़काव, बेहतर क्वालिटी वाले बीज और जैविक खेती जैसी तकनीकें पैदावार बढ़ा रही हैं. समय पर मिलने वाले मौसम के अपडेट्स और फसल बीमा योजनाओं से आपदाओं के दौरान किसानों के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
अनाज उगाने के बाद भी एक बहुत बड़ी मात्रा थाली तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाती है. दुनिया में 13 फीसदी खाना कटाई के बाद खराब होता है और 19 फीसदी खाना दुकानों और घरों में बर्बाद होता है. भारत में भी कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउस की कमी के कारण फल-सब्जियां खराब हो जाती हैं. इसके साथ ही, खेती में 70 फीसदी ताजे पानी का इस्तेमाल होता है, जिससे भूजल स्तर गिर रहा है. भारत में पानी की प्रति बूंद अधिक फसल और मिट्टी की सेहत सुधारने वाले तरीकों को तेजी से अपनाना होगा.
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हमारे छोटे किसान, महिलाएं और युवा हैं. arya.ag के रिपोर्ट में कहा गया है कि खेत में पुरुषों जितना काम करने के बावजूद महिला किसानों को जमीन, लोन और आधुनिक मशीनों तक पहुंच कम मिलती है, जिससे उनकी पैदावार में 24 फीसदी का अंतर आता है. देश के करोड़ों युवा स्टार्टअप्स, एग्री-टेक और आधुनिक खेती के जरिए कृषि क्षेत्र को नया रूप दे रहे हैं. हमारे आदिवासी और स्थानीय समुदायों के पास पारंपरिक जल संरक्षण और जैविक खेती का गहरा ज्ञान है, जो पर्यावरण को बचाने में कारगर है.
कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव के लिए सरकारों, निजी कंपनियों और शोध संस्थानों को मिलकर काम करना होगा. कृषि अनुसंधान में निवेश करने से देश को सबसे अधिक आर्थिक और सामाजिक फायदा मिलता है. सरकार को ग्रामीण सड़कों, कोल्ड चेन और कृषि शिक्षा पर बजट बढ़ाना होगा. वहीं, निजी कंपनियों को सस्ते कृषि उपकरण बनाने और किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने वाले व्यावसायिक मॉडल विकसित करने होंगे, ताकि छोटे किसानों की कमाई बढ़ सके.
विश्व खाद्य दिवस सिर्फ बड़ी नीतियों और सम्मेलनों तक सीमित नहीं है, यह हम सब से जुड़ा है. हमारी छोटी-छोटी आदतें देश की खाद्य प्रणाली को बदल सकती हैं. थाली में उतना ही खाना लें जितनी ज़रूरत हो, भोजन की बर्बादी पूरी तरह रोकें, और अपने आहार में मोटे अनाज बाजरा, ज्वार, रागी को शामिल करें. जब भारत का हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझेगा, तभी हम अपने देश के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए एक सुरक्षित, समृद्ध और कुपोषण-मुक्त भविष्य का निर्माण कर सकेंगे.