
मेघालय में सैटेलाइट सर्वे की मदद से 3.4 लाख हेक्टेयर से अधिक ऐसी जमीन की पहचान की गई है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में खेती के लिए किया जा सकता है. यह क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 15.2 फीसदी है. जर्नल ऑफ जियोग्राफी, एनवायरनमेंट एंड अर्थ साइंस इंटरनेशनल में अक्टूबर में प्रकाशित एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है. हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि चिह्नित जमीन को खेती योग्य मानने से पहले उसकी मिट्टी, ढलान और पानी की उपलब्धता समेत अन्य पहलुओं की जांच जरूरी है.
अध्ययन के मुताबिक, मेघालय में कृषि उपयोग के लिए संभावित रूप से चिह्नित जमीन का कुल क्षेत्रफल 3,40,673.36 हेक्टेयर है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कम घनी झाड़ियों वाले क्षेत्रों का है. ऐसे क्षेत्रों का रकबा 2,06,595.18 हेक्टेयर है, जो कुल चिह्नित जमीन का 60.64 फीसदी है. वहीं, घनी झाड़ियों वाले क्षेत्र 99,488.89 हेक्टेयर में फैले हैं. इनकी हिस्सेदारी 29.20 फीसदी है. इसके अलावा, झूम खेती वाले 34,331.34 हेक्टेयर क्षेत्र की पहचान की गई है, जबकि घास के मैदानों और चरागाहों का रकबा 257.94 हेक्टेयर है.
यह अध्ययन नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के तुरा स्थित बागवानी विभाग और नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (NESAC), उमियम से जुड़े शोधकर्ताओं रोनक मीना, चंदन गोस्वामी, सीपी सुरेश और अकमाउल हक ने किया है. शोध में 2025-26 की मल्टीस्पेक्ट्रल सैटेलाइट तस्वीरों और LISS-IV सेंसर से हासिल डेटा का इस्तेमाल किया गया. इसके आधार पर जमीन को घनी झाड़ियों, कम घनी झाड़ियों, घास के मैदानों और चरागाहों और झूम खेती वाले क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया.
शोधकर्ताओं ने जमीन की संभावित पुनर्विकास प्राथमिकता तय करने के लिए 100 अंकों का स्कोर निर्धारित किया. इसमें कम घनी झाड़ियों वाले क्षेत्रों को 95 अंक मिले, जबकि घनी झाड़ियों वाले क्षेत्रों को 80 अंक दिए गए. झूम खेती वाले क्षेत्रों का स्कोर 60 और घास के मैदानों एवं चरागाहों का स्कोर 25 रहा. यह वर्गीकरण जमीन के संभावित इस्तेमाल की प्राथमिकता बताता है. इससे यह साबित नहीं होता कि अधिक अंक पाने वाली जमीन पर बिना किसी अतिरिक्त तैयारी के खेती शुरू की जा सकती है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अध्ययन में चिह्नित जमीन की मिट्टी की गुणवत्ता, ढलान, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता, पहुंच और खेती की आर्थिक व्यवहार्यता का विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया गया है. इसलिए इन क्षेत्रों को सीधे खेती योग्य भूमि घोषित नहीं किया जा सकता. इसके लिए मौके पर जाकर जांच और विस्तृत भूमि सर्वेक्षण की जरूरत होगी.
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जमीन के पुनर्विकास की योजना बनाते समय झाड़ीदार वनस्पति की पर्यावरणीय भूमिका और झूम खेती पर निर्भर लोगों की आजीविका को ध्यान में रखना होगा. विशेष रूप से उन इलाकों में सावधानी जरूरी है, जहां जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ सकता है.
शोध में तैयार भूमि वर्गीकरण मानचित्र की समग्र सटीकता 86 फीसदी दर्ज की गई. इसके लिए 200 संदर्भ नमूनों की जांच की गई, जिनमें से 172 का वर्गीकरण सही पाया गया. शोधकर्ताओं ने यह भी साफ किया कि अध्ययन में चिह्नित जमीन पर वास्तविक पुनर्विकास नहीं किया गया है और न ही यह आकलन किया गया है कि वहां कौन-कौन सी फसलें उगाई जा सकती हैं.
अध्ययन के निष्कर्षों से मेघालय में भूमि उपयोग की योजना बनाने और कृषि विकास की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आधार मिल सकता है. हालांकि, जमीन को खेती के लिए इस्तेमाल करने का फैसला विस्तृत वैज्ञानिक जांच के बाद ही किया जा सकेगा. (पीटीआई)