
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य, जैसे नागालैंड,अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैविक खेती के लिए जाने जाते हैं. यहां की जलवायु कीवी, किंग चिली और हल्दी जैसी कीमती फसलों के लिए बेहतरीन है. हालांकि, ऊबड़-खाबड़ रास्ता और बिजली की कमी के कारण यहां के किसानों को फसल कटाई के बाद भारी नुकसान झेलना पड़ता था. वही हमारे देश में अक्सर टमाटर, अदरक, प्याज, आलू और हल्दी उगाने वाले किसानों को बाजार में सही दाम नहीं मिल पाता और मजबूरी में उन्हें अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती है या वह खराब हो जाती है. ऐसे में स्वयीवेज़ो डज़ुडो जैसे शिक्षित युवाओं ने एक मिसाल पेश की है. पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद, उन्होंने शहरों की ओर भागने के बजाय अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया. उन्होंने देखा कि किसान मेहनत तो बहुत करते हैं, लेकिन आधुनिक सुविधाओं के अभाव में उनकी फसल सड़ जाती है. इसी समस्या को हल करने के लिए उन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग कर एक ऐसी तकनीक विकसित की जो पूरी तरह से स्थानीय और सस्ती है.
स्वयीवेज़ो ने एक ऐसा सोलर ड्रायर बनाया है जो पूरी तरह से 'कबाड़ से जुगाड़' के सिद्धांत पर काम करता है. इसे बनाने में बांस, लकड़ी, एल्युमिनियम के पुराने कैन और खराब हो चुके पंखों के हिस्सों का इस्तेमाल किया गया है. यह मशीन पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर चलती है, जिसका मतलब है कि इसमें न तो बिजली का खर्चा है और न ही ईंधन की जरूरत. यह ड्रायर फसलों को धूल, मिट्टी, कीड़े-मकौड़ों और सूरज की हानिकारक अल्ट्रा-वायलेट किरणों से बचाता है. पुराने पंखों का उपयोग इसमें हवा के संचार को बनाए रखने के लिए किया गया है, जिससे फसल के अंदर की नमी तेजी से निकल जाती है और फल या सब्जियां लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं.
एक आम औद्योगिक ड्रायर की कीमत लाखों में होती है, जिसे छोटा किसान कभी नहीं खरीद सकता. लेकिन स्वयीवेज़ो का यह सोलर डायर मशीन मात्र 5,000 से 8,000 रूपये के बीच तैयार हो जाता है. यह बाजार में मिलने वाले ड्रायर्स से लगभग 90 फीसदी सस्ता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सुखाने के समय को 30 फीसदी तक कम कर देता है. अगर आसान शब्दों में कहें, तो इस मशीन पर लगाया गया हर 1 रुपया किसान को करीब 2.8 रुपये का मुनाफा कमा कर देता है. यह मशीन न केवल तेज धूप में, बल्कि मानसून के दौरान भी नमी को नियंत्रित कर फसलों को बचाने में कारगर है, जिससे किसानों की साल भर की कमाई सुनिश्चित रहती है.
सब्जी और फल उगाने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनका जल्दी खराब होना है. टमाटर, मिर्च, कीवी और हल्दी जैसी फसलें अगर समय पर न बेची जाएं या सुखाई न जाएं, तो वे सड़ने लगती हैं. यह सोलर ड्रायर इन फसलों की उम्र बढ़ा देता है. सूखी हुई मिर्च या हल्दी को किसान तब बेच सकते हैं जब बाजार में कीमतें सबसे अधिक हों. इसके अलावा, यह ड्रायर फसलों के पोषक तत्वों, जैसे विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट को भी सुरक्षित रखता है, जिससे बाजार में किसान को अपनी उपज का बेहतर दाम मिलता है. यह तकनीक विशेष रूप से उन दुर्गम इलाकों के लिए वरदान है जहां बिजली की सप्लाई घंटों तक कटी रहती है.
स्वयीवेज़ो का यह नवाचार केवल नागालैंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश भर में सब्जी, फल और मसाला उत्पादकों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है. ऐसे में कम पूंजी वाले छोटे किसानों के लिए यह सस्ता सोलर ड्रायर किसी वरदान से कम नहीं है. इसे देश के उन सभी हिस्सों में आसानी से फैलाया जा सकता है जहां धूप तो भरपूर है, लेकिन बिजली की किल्लत रहती है. इस मॉडल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे बनाने के लिए जरूरी सामान स्थानीय स्तर पर ही मिल जाता है, जिससे इसे कहीं भी तैयार किया जा सकता है. स्वयीवेज़ो की यह सफलता साबित करती है कि जब शिक्षित युवा अपनी काबिलियत का इस्तेमाल गांव की समस्याओं को सुलझाने में करते हैं, तो न केवल किसानों का मुनाफा बढ़ता है, बल्कि पूरे गांव की आर्थिक तस्वीर बदली जा सकती है.
ये भी पढ़ें-