बिहार में कमजोर मॉनसून का खतरा: धान किसानों की बढ़ी चिंता, सरकार लाई वैकल्पिक फसल योजना

बिहार में कमजोर मॉनसून का खतरा: धान किसानों की बढ़ी चिंता, सरकार लाई वैकल्पिक फसल योजना

बिहार में इस वर्ष मॉनसून के सामान्य से कम रहने और अल-नीनो के संभावित प्रभाव ने धान किसानों की चिंता बढ़ा दी है. राज्य में 34 से 36 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है, लेकिन बारिश की कमी से उत्पादन पर संकट मंडरा रहा है. कृषि विभाग ने आकस्मिक फसल योजनाएं तैयार की हैं, जिनमें मक्का, बाजरा, दालें और तेलहन जैसी वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है. हालांकि, कई किसान इन विकल्पों और नई तकनीकों को लेकर संशय में हैं, जिससे सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.

पंजाब हरियाणा के किसान करें इन क़िस्मों की खेतीपंजाब हरियाणा के किसान करें इन क़िस्मों की खेती
अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Jun 25, 2026,
  • Updated Jun 25, 2026, 5:49 PM IST

मौसम विभाग ने बिहार में मॉनसून की बारिश सामान्य से कम होने की संभावना व्यक्त की है. साथ ही इस साल अल-नीनो का संभावित प्रभाव राज्य में देखने को मिल सकता है. इन तमाम समस्याओं को देखते हुए राज्य के अंदर करीब 34 से 36 लाख हेक्टेयर में धान की खेती करने वाले किसान भी चिंतित हैं. धान का बिजड़ा धीरे-धीरे तैयार होने की अवस्था में है, जहां कुछ किसान धान की रोपनी शुरू कर चुके हैं. जुलाई के महीने में धान की रोपनी की रफ्तार तेज हो जाएगी. लेकिन राज्य के अंदर बढ़ते तापमान और बारिश का गिरता हुआ ग्राफ देखकर किसानों को अपनी फसल के सुरक्षित होने की भविष्य की चिंता सता रही है. कृषि विभाग सभी जिलों के लिए आकस्मिक फसल योजनाएं तैयार करवा रहा है, ताकि किसानों को प्रतिकूल परिस्थिति में भी वैकल्पिक खेती के अवसर उपलब्ध हों और उनकी आय प्रभावित न हो.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि खरीफ सीजन में धान की खेती करने वाले किसान वैकल्पिक खेती की ओर रुचि दिखाएंगे? हाल के समय में कैमूर, रोहतास, बक्सर, भोजपुर, औरंगाबाद सहित अन्य कई ऐसे जिले हैं, जहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है और इन तमाम जिलों के किसानों के लिए खरीफ सीजन में खेती के तौर पर धान ही पहला और आखिरी विकल्प रहता है. अब वैसे किसानों को वैकल्पिक खेती की ओर लाना कृषि विभाग के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.

अल-नीनो में वैकल्पिक फसलों की खेती बनेगी सहारा

कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि अल-नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए केंद्र और राज्य के कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से सभी जिलों के लिए आकस्मिक फसल योजनाएं तैयार की गई हैं. इन योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में किसानों को वैकल्पिक खेती के अवसर उपलब्ध हों और उनकी आय प्रभावित न हो.

आकस्मिक फसलों की खेती से जुड़ी रूपरेखा तैयार

कृषि मंत्री सिन्हा ने बताया कि सारण और तिरहुत प्रमंडल के किसानों के लिए 90 से 135 दिनों में तैयार होने वाली फसलों, जैसे तोरिया, लोबिया और अगात मूली की विशेष कार्ययोजना बनाई गई है. वहीं मुंगेर, भागलपुर, कोसी और पूर्णिया क्षेत्र में कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए नमी संरक्षण, मल्चिंग और निकौनी जैसी तकनीकों को अपनाने की सलाह दी जा रही है. यदि व्यापक क्षति की स्थिति उत्पन्न होती है तो सूर्यमुखी, सोयाबीन और पशु चारे के लिए अफ्रीकन लंबा मक्का और घास की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी की गई है. वहीं पटना और मगध प्रमंडल में धान की परंपरागत रोपनी के स्थान पर कम पानी वाली सीधी बुआई तकनीक को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है. जिन क्षेत्रों में धान उत्पादन की संभावना कम है, वहां मक्का, बाजरा, उड़द, कुल्थी और अगात आलू जैसी वैकल्पिक फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है.

धान की सीधी बुआई से किसान असहमत

रोहतास जिले के किसान अर्जुन सिंह बताते हैं कि सरकार द्वारा वैकल्पिक फसलों की खेती और धान की सीधी बुआई तकनीक केवल कागजों और बोलने के लिए सही है. वास्तविकता में इसका किसानों को कोई लाभ नहीं है. धान की सीधी बुआई तकनीक में मेहनत भी अधिक लगती है और उत्पादन भी कम होता है. इस तकनीक में दो महीने के अंदर धान के पौधों के साथ झरंगा (धान के पौधों जैसा दिखने वाला खरपतवार) उग जाता है, जिसे उस समय तक पहचानना संभव नहीं होता. वहीं जब यह थोड़ा बड़ा होता है और झरंगा और धान की पहचान हो पाती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है. 

आगे अर्जुन सिंह कहते हैं कि भारत सरकार की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को छोड़कर किसानों को कृषि से कोई जुड़ी भी योजनाओं का लाभ कभी भी 100 प्रतिशत नहीं मिलता. केवल कागजों में योजनाएं पूरी दिखाई जाती हैं, जबकि वास्तविकता में वे अधूरी ही रहती हैं.

वहीं दूसरी ओर कैमूर जिले के किसान ओम प्रकाश कहते हैं कि वैकल्पिक फसलों की खेती 2 से 4 बीघा में संभव है, उसे बड़े पैमाने पर नहीं किया जा सकता. सरकार को खरीफ और रबी सीजन की मुख्य फसलों की खेती को और बेहतर बनाने पर काम करने की जरूरत है. अगर आप मक्का या बाजरा बड़े पैमाने पर करते हैं, तो इसका उत्पादन धान और गेहूं की तुलना में काफी कम होता है. जिन इलाकों में पूरी तरह धान की खेती होती है, यदि किसी कारणवश खेती नहीं हो पाती, तो क्या उन जगहों पर मक्का या बाजरा की खेती करना संभव है? आज सरकार और वैज्ञानिकों की बातें कागजों पर और सुनने में जितनी अच्छी लगती हैं, उनका वास्तविकता से उतना संबंध नहीं है.

MORE NEWS

Read more!