Philosopher Farmer : बाजार के बजाय परिवार के लिए खेती कर रहा यह दार्शनिक किसान

Philosopher Farmer : बाजार के बजाय परिवार के लिए खेती कर रहा यह दार्शनिक किसान

Climate Change से हो रहे नुकसान का सबसे पहले किसानों को ही सामना करना पड़ रहा है. प्राकृतिक असंतुलन के कारण पनपी इस चुनौती से निपटने में किसानों की ही अग्रणी भूमिका भी है. इस बात को समझने के लिए Progressive Farmers खेती के दर्शन पर काम कर रहे हैं, जिससेे प्रकृति के नियमों को आधार बनाकर उन्नत खेती की जा सके.

आवर्तनशील खेती के नाम से प्राकृतिक खेती का नया मॉडल उभर रहा है बुंदेलखंड में
न‍िर्मल यादव
  • Chhatarpur,
  • May 02, 2024,
  • Updated May 02, 2024, 9:17 PM IST
पर्यावरण असंतुलन के खतरे को भांपते हुए वैज्ञानिक भी अब यह मानने लगे हैं कि खेती को व्यापार मानकर तकनीक की मदद से संसाधनों का बेतहाशा उपयोग, समूची कायनात के लिए नुकसान का सौदा साबित हो रहा है. किसानों का एक वर्ग ऐसा भी है जो Modern Farming का हिमायती होने के कारण प्रकृति के साथ तालमेल कायम कर खेती के पारंपरिक तरीके अपनाने पर जोर दे रहा है. इसमें Organic Farming को बढ़ावा देते हुए बाजार के बजाय अपने परिवार के लिए मिश्रित खेती करने की बात कही जा रही है. इसके मद्देनजर बुंदेलखंड में प्राकृतिक खेती का मॉडल विकसित करने के लिए खेती के दार्शनिक पहलुओं पर काम किया जा रहा है. एमपी में छतरपुर जिले के नौगांव में प्रगतिशील किसान भगवान सिंह परमार ने मध्यस्थ दर्शन पर आधारित खेती का एक Model Farm बनाया है. परमार के 10 बीघा खेत में बने इस मॉडल फार्म में Farming Philosophy की झलक साफ तौर पर देखी जा सकती है.

विलुप्त प्राय स्थानीय पेड़ों का बाग

परमार ने किसान तक को बताया कि उन्होंने अपने 10 बीघा के खेत को इस तरह से डिजाइन किया है, जिससे खेती करते हुए प्राकृतिक संतुलन कायम करने में मदद मिल सके. इसके लिए उन्होंने अपने खेत में एक Food Forest बनाया है. इसमें ऐसे Medicinal Plants लगे हैं, जो स्थानीय हैं और उन्हें भुला दिया गया है. इनमें खैर यानी कत्था, महुआ और कचनार के अलावा फलदार पेड़ों में कैथ, इमली, बेर जैसे देसी फलों के साथ केला, अंजीर, चीकू, लीची अमरूद और आम शामिल हैं. इतना ही नहीं, अश्वगंधा और स्टीविया सहित तमाम औषधीय गुणों वाले पौधों के साथ बबूल जैसे जंगली पेड़ों की वन खेती यानी Forest Farming का सफल मॉडल बनाया है.
 
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दर्शन पर आधारित खेती से पर्याप्त आय होने के सवाल पर परमार ने वन खेती में आंवले का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके खेत पर आंवले के 125 पेड़ लगे हैं. उन्होंने कहा कि किसान आंवले को प्रोसेस करके अभी अचार या मुरब्बा ही बनाते हैं. हमने इसकी प्रोसेसिंग को आगे ले जाकर आंवले की मिठाइयां बनाई हैं. इनमें दूध के उत्पादों का प्रयोग न करते हुए पेठा की तर्ज पर आंवले की बर्फी और लड्डू बनाया गया है. इसी प्रकार खैर के पेड़ से कत्था, केला से चिप्स और सहजन की पत्त‍ियों का पाउडर एवं अन्य उत्पाद बनाकर भरपूर आय हो जाती है.

मकसद है खाद्य श्रृंखला की पूर्ति करना

परमार ने Farming Philosophy का हवाला देते हुए कहा कि किसान, खेती के रूप में प्रकृति को सजाने का काम करता है. खेती को जब से व्यापार बना दिया गया है, तभी से किसानों की दुर्दशा होना शुरू हुई. उन्होंने कहा कि सिर्फ गेहूं और धान जैसी Cash Crop उपजाने से प्रकृति का संतुलन गड़बड़ हुआ, साथ ही Food Chain यानि खाद्य श्रृंखला भी बुरी तरह प्रभावित हुई है. इससे किसान और कुदरत दोनों का नुकसान हुआ है.
उन्होंने कहा कि भारत में खेती की परंपरा को अगर देखें तो Green Revolution से पहले तक, किसान के लिए खेती, व्यापार नहीं बल्कि व्यवसाय था. व्यवसाय और व्यापार में अंतर स्पष्ट करते हुए परमार ने कहा कि भारत की परंपरागत खेती पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पूर्णत: वस्तु विनिमय से संचालित होती थी. किसान के लिए यही व्यवसाय था, जिसमें वह खाद्य श्रृंखला को पूरा करने वाली अन्न, फल, दूध आदि हर संभव वस्तुएं उपजा कर इनके बदले में उन वस्तुओं को खरीद लेता था जिसे वह खुद नहीं उपजा पाता था. वहीं, व्यापार में उपज का विनिमय पैसे के रूप में होता है. इससे किसान बहुफसली खेती करने के बजाय बाजार के लिए खेती का व्यापार करने लगा. जबकि पहले का किसान व्यवसाय करते हुए, बाजार के लिए नहीं, बल्कि परिवार के लिए खेती करते हुए खुशहाल था.
 
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स्थानीय कला और तकनीक पर जोर

किसान की बाजार पर से निर्भरता को न्यूनतम करने के लिए परमार अब ग्रामीण कला और तकनीक पर काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि 5 दशक पहले तक गांवों में सिर्फ दो वस्तुएं, नमक और लोहा ही बाजार से आता था. इनके अलावा कृष‍ि यंत्र से लेकर टोकरी और चप्पल सहित रोजमर्रा की लगभग सभी वस्तुएं गांव में ही मिल जाती थीं. यह व्यवस्था वस्तु विनिमय पर आधारित थी, इसलिए ये सभी वस्तुएं वाजिब कीमत पर किसानों को मिल जाती थीं. यही वजह है कि महंगाई जैसी अवधारणा का ग्रामीण व्यवस्था में कोई स्थान ही नहीं था.
परमार ने कहा कि गांधी जी के सपनों का ग्राम स्वराज सही मायने में यही था. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को फिर से वापस लौटाने के लिए वह अपने फार्म पर Rural Art and Technology पर काम कर रहे हैं. इस प्रयास के तहत ही उन्होंने किसानों को दिमागी शांति, मानसिक उत्साह और ऊर्जा देने वाली स्थानीय लोक कलाओं को पुनर्जीवित करने एवं ग्रामीण जीवन से जुड़ी जल संतुलन की तकनीक से लेकर खेती के पारंपरिक यंत्रों को नए सिरे से डिजाइन करना शुरू किया है. इनकी मदद से ग्रामीण जीवन काे आसान बनाते हुए खेती की लागत को भी सीमित करने में मदद मिलेगी.

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