हरी खाद डालने के फायदे (Benefits of Green Manure)किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए कृषि विभाग द्वारा हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है.यह दलहनी फसल वायुमंडल की नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर प्राकृतिक रूप से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, जिससे यूरिया की आवश्यकता कम हो जाती है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है.
कृषि विभाग के अनुसार जिले में प्रचलित धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्रों में ढैंचा को हरी खाद के रूप में शामिल करने से किसानों को आर्थिक और कृषि दोनों स्तरों पर लाभ मिल सकता है.विभाग किसानों को इसके उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रहा है और कुल लागत पर 50 प्रतिशत अनुदान भी उपलब्ध करा रहा है.
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ढैंचा एक ऐसी दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अवशोषित कर भूमि में स्थिर करते हैं. इससे मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है और फसलों को आवश्यक पोषण मिलता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ढैंचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध होती है. इतनी नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की आवश्यकता पड़ती है. इस प्रकार किसान प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत कर सकते हैं.
कृषि विभाग के अनुसार ढैंचा की बुवाई मानसून के प्रारंभ में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए. बुवाई के लगभग 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचे हो जाएं और फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में हों, तब उन्हें खेत में मिट्टी के भीतर मिला देना चाहिए.
इसके लिए किसान ट्रैक्टर चालित डिस्क हैरो, रोटावेटर या मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग कर सकते हैं. पर्याप्त नमी बनाए रखने पर 15 से 20 दिनों के भीतर ढैंचा पूरी तरह सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाता है और उसके पोषक तत्व फसलों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं.
ढैंचा के विघटन से भूमि में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है. इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, जलधारण क्षमता में सुधार आता है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है.
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित रूप से ढैंचा का उपयोग करने से मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है और आगामी फसलों की वृद्धि एवं उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जहां मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, वहीं पर्यावरण प्रदूषण की आशंका भी बढ़ती है. इसके विपरीत ढैंचा एक प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है, जो टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देता है.
हरी खाद के रूप में इसका उपयोग खेती की लागत घटाने के साथ-साथ भूमि की उत्पादकता बनाए रखने में भी सहायक है.
कृषि विभाग ने किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए ढैंचा बीज पर 50 प्रतिशत अनुदान देने का प्रावधान किया है.इच्छुक किसान बीज प्रक्रिया केंद्र एवं बीज निगम कार्यालय, कौरिनभाठा (राजनांदगांव) से ढैंचा बीज प्राप्त कर सकते हैं.
विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे मानसून की शुरुआत में ढैंचा की बुवाई करें, 35 से 40 दिन बाद इसे मिट्टी में मिलाएं और 15 से 20 दिन पश्चात मुख्य फसल की बुवाई या रोपाई करें.इससे भूमि की उर्वरता बढ़ेगी, यूरिया की खपत कम होगी और बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकेगा.
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