बनारसी साड़ी से मुजफ्फरनगर के गुड़ तक, GI टैग बदल रहा किस्मत

बनारसी साड़ी से मुजफ्फरनगर के गुड़ तक, GI टैग बदल रहा किस्मत

GI टैग भारत के पारंपरिक उत्पादों को असली पहचान दिलाने वाला प्रमाण पत्र है. इससे किसानों, बुनकरों और कारीगरों को बेहतर कीमत, नई बाजारों तक पहुंच और अधिक कमाई का मौका मिलता है. जानिए GI टैग क्या है, इसके क्या फायदे हैं और सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए कौन-कौन सी योजनाएं चला रही है.

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बनारसी साड़ी से मुजफ्फरनगर के गुड़ तक, GI टैग बदल रहा किस्मतGI टैग से बढ़ेगी किसानों की आमदनी

भारत के कई पारंपरिक और खास उत्पाद आज दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. इसका सबसे बड़ा कारण है जीआई (Geographical Indication) टैग. यह टैग किसी उत्पाद की असली पहचान और उसके खास क्षेत्र से जुड़े होने की गारंटी देता है. इससे न केवल नकली उत्पादों पर रोक लगती है, बल्कि किसानों, बुनकरों और कारीगरों की आमदनी भी बढ़ती है. सरकार भी जीआई टैग वाले उत्पादों को देश और विदेश के बाजारों तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चला रही है.

क्या होता है GI टैग?

जीआई टैग एक ऐसा प्रमाण पत्र है, जो यह बताता है कि कोई उत्पाद किसी खास क्षेत्र में पारंपरिक तरीके से बनाया गया है. उदाहरण के लिए, बनारसी साड़ी केवल वाराणसी की पारंपरिक तकनीक से बनाई जाती है. जीआई टैग मिलने के बाद ग्राहक असली और नकली उत्पाद में आसानी से अंतर कर सकते हैं. इससे असली उत्पाद की कीमत बढ़ती है और उसे बनाने वाले कारीगरों को बेहतर आय मिलती है.

किसानों और कारीगरों को कैसे मिलता है फायदा?

जीआई टैग मिलने से उत्पाद की बाजार में पहचान मजबूत होती है. इससे देश और विदेश में उसकी मांग बढ़ती है और उत्पाद बेहतर कीमत पर बिकता है. इससे किसानों और कारीगरों की आय में भी बढ़ोतरी होती है. वस्त्र मंत्रालय के अनुसार, जीआई टैग मिलने के बाद ग्रामीण कारीगरों की आमदनी में 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है. इससे पारंपरिक कला और संस्कृति भी सुरक्षित रहती है.

मुजफ्फरनगर के गुड़ की सफलता बनी मिसाल

उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर गुड़ इसका अच्छा उदाहरण है. जीआई टैग मिलने के बाद इसकी पहचान और मजबूत हुई. वर्ष 2025 में बृजनंदन एग्रो फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी ने 30 मीट्रिक टन गुड़ बांग्लादेश को निर्यात किया. इससे कंपनी के 545 किसानों को नए बाजार मिले और उनकी आय बढ़ाने में मदद मिली.

भारत में GI टैग वाले उत्पाद लगातार बढ़ रहे हैं

भारत में सबसे पहले पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग चाय को जीआई टैग मिला था. इसके बाद देश के कई कृषि उत्पाद, हस्तशिल्प, खाद्य पदार्थ और प्राकृतिक उत्पादों को यह पहचान मिली. दिसंबर 2025 तक देश में 445 हस्तशिल्प, 251 कृषि उत्पाद, 66 खाद्य उत्पाद, 64 विनिर्मित उत्पाद और 5 प्राकृतिक उत्पाद जीआई टैग प्राप्त कर चुके हैं.

उत्तर प्रदेश सबसे आगे

जीआई टैग वाले उत्पादों की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है. दिसंबर 2025 तक राज्य के 81 उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है. इसके बाद तमिलनाडु के 76 और महाराष्ट्र के 55 उत्पाद इस सूची में शामिल हैं. उत्तर प्रदेश के बनारसी उत्पाद, कन्नौज का इत्र और कई अन्य पारंपरिक वस्तुएं अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं.

GI टैग का पंजीकरण कैसे होता है?

किसी भी उत्पाद को जीआई टैग दिलाने के लिए उत्पादकों का संगठन, संस्था या कानून के तहत बनाई गई कोई अधिकृत संस्था आवेदन कर सकती है. आवेदन चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री में जमा किया जाता है. एक बार पंजीकरण होने के बाद जीआई टैग 10 साल तक मान्य रहता है और बाद में इसका नवीनीकरण कराया जा सकता है.

सरकार दे रही कई तरह की मदद

सरकार जीआई टैग वाले उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है. पीएम एकता मॉल, वन स्टेशन वन प्रोडक्ट (OSOP), जीआई ट्रेल, एमएसएमई इनोवेटिव स्कीम और एपीडा जैसी योजनाओं के जरिए उत्पादों को नए बाजार, निर्यात के अवसर और आर्थिक सहायता दी जा रही है. इसके अलावा जीआई पंजीकरण की फीस में 80 प्रतिशत तक की कमी भी की गई है, जिससे छोटे उत्पादकों को राहत मिली है.

विदेशों में भी बढ़ रही भारतीय GI उत्पादों की मांग

भारत के जीआई टैग वाले उत्पाद अब दुनिया के कई देशों में निर्यात किए जा रहे हैं. ब्रिटेन, इटली, अमेरिका, यूएई, दक्षिण कोरिया, कनाडा, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है. सरकार का लक्ष्य आने वाले समय में और अधिक भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना है, ताकि किसानों और कारीगरों को इसका सीधा लाभ मिल सके.

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